nihal chandra shivhare
Saturday, 10 December 2016
Sunday, 20 December 2015
Friday, 18 December 2015
Wednesday, 16 December 2015
मेरी कल्पना
''मेरी कल्पना तेरी आशा
मिलकर बने नई परिभाषा ।
स्वाति बूँद की चाहत में
चातक अब क्यों रहे प्यासा ।
अमृत कलश की चाहत में
पूर्ण हो सिंधु-मंथन अभिलाषा ॥''
मिलकर बने नई परिभाषा ।
स्वाति बूँद की चाहत में
चातक अब क्यों रहे प्यासा ।
अमृत कलश की चाहत में
पूर्ण हो सिंधु-मंथन अभिलाषा ॥''
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