Sunday, 20 December 2015

हरा भरा वन भाता है क्यों ? 
खिला सुमन मुरझाता है क्यों ? 
जीवन एक क्रम है 
सबको नाच नचाता है क्यों ?

Friday, 18 December 2015

मारीच का झूठा क्रन्दन, 
रावण सीता का हरण कर लेता 
युधिष्ठिर का एक झूठ सत्य में परिवर्तित हो 
द्रोण का वध करवा देता है 
महत्वकांछी झूठ का सहारा ले 
प्रगति कर रहे है , और सत्य ?
झूठ के बोझ तले कराहता रहा है, कराह रहा है
और कराहता रहेगा |

Wednesday, 16 December 2015

मेरी कल्पना

''मेरी कल्पना तेरी आशा 
मिलकर बने नई परिभाषा । 
स्वाति बूँद की चाहत में 
चातक अब क्यों रहे प्यासा । 
अमृत कलश की चाहत में 
पूर्ण हो सिंधु-मंथन अभिलाषा ॥''